चोटी की पकड़–57

"हमको रुपया नहीं चाहिए।" तनकर जटाशंकर ने कहा।


"यही तुम्हारा बड़प्पन है। हम इसी को प्यार करते हैं। मेरे प्यारे, मुझे चूम लो।" मुन्ना ने जीभ लपलपायी।

जटाशंकर को जान पड़ा, काल है। खज़ाने की चोरी की बात सोचते हुए तनकर सिपाहियाने स्वर से कहा, "गलत बात है,; ख़ज़ाने की चोरी नहीं हो सकती।"

"क्यों?"

"अब तू ही बता," कहकर फिर उन्होंने एक कड़ी निगाह गाड़ी।

"यह जो जमादार बना है, इसी ने चुरवाया है, यह रानी का प्यारा।"

"झूठ बात, हम रपोट करेंगे।"

"क्यों रपोट करोगे?"

"यही तू जो कुछ कहती है।"

"तुमको और तुम्हारे पहरेदार को ये दूसरे पहरेदार पकड़े हुए हैं कि तुम लोग बदमाश हो। मैं इनकी गवाही गुजार दूँगी। तुम ठोंके जाओगे, नौकरी से भी हाथ धोओगे।"

"हम कहेंगे, खजाना चुराने का इसने जाल किया है। हमसे पहले ऐसा ऐसा कह चुकी है।"

"खजाना चुरा गया है, तुम्हें इसका क्या पता? अगर न चुरा गया हो?"

जमादार ने करुण दृष्टि से देखा। मुन्ना ने कहा, "अच्छा लाख-दो लाख दे दिए जाएं तो तुम क्या करो?"

"हम खज़ाने में रखा देंगे।"

"कैसे?"

जमादार फिर हक्के-बक्के हुए।

मुन्ना ने कहा, "जमादारी चाहते हो तो चलो, बैठो, लेकिन याद रक्खो, जिस दिन खजानची आएगा, उस दिन तुम्हारा कोई कर्म बाकी नहीं रहेगा। 

बात मानोगे तो बचे-बचाये चले जाओगे। चोरी और छिनाले का भेद तब तक नहीं खुल सकता जब तक रानी का मान वापस नहीं आ जाता।"

"रुस्तम की वर्दी पहनकर रुस्तम की जगह पहरा दो और रुस्तम को जमादार मानो।" कहकर मुन्ना नए गढ़ की तरफ चली।

   0
0 Comments